Friday, March 29, 2013

बातें बेवजह

बड़ी देर से हाथ डगमगा रहे हैं,
शब्द भी हैं, भाव भी हैं,
किन्तु छंद नहीं है,
जिसको अपने मन की बात बतानी है,
वो भी नहीं है,
शायद उसे डर था
मैं फिर अपनी किताब खोलकर बैठ जाऊंगा,

हर बात कहने लायक नहीं होती,
कुछ बातें बेवजह की होती हैं,
मैं जानता हूँ उन बातों को,
इसलिए पृथक कर रख लेता हूँ,
एक कमरे में हृदय के परम छोर पर,
जहाँ केवल मैं जा सकता हूँ,

किन्तु अब भी मेरे हृदय में,
एक बात बड़ी जोर से चुभती है,
कि एक बार,
बस आखिरी बार,
तुमने सुना होता मुझे,

जाने से पहले एक बार,
झाँका होता मेरे मन को,
टटोली होती बेवजह की बातें,
हर भाव को शब्दों में पिरोना बड़ा मुश्किल होता है,
उन्हें मेरी आँखों में खोजा होता,
काश! एक बार।

तो शायद,
फिर कभी न खोलता वह कमरा,
न कहता कभी यह बातें बेवजह।

Monday, March 25, 2013

प्रेम

ढल रही है शाम,
हवा भी मद्धम हो चली है,
अंतहीन ख़ामोशी,
सुन सकता हूँ मैं अब,
तुम्हारी सरगोशियाँ,
मेरे कानों में,

सम्भ्रमित मैं,
पत्तों की सरसराहट से,
कि कहीं यह तुम्हारी आमद तो नहीं,
व्याकुलता से दरवाजे को ताकता,
मुस्कुराता हूँ,
####

प्रेम सबको ढूँढ ही लेता है,
सुख की घनी चादर बनकर,
ढक दे जो छोटे छोटे दुखों को,
प्रेम आता है जीवन में,
बनकर उपहार,
अलग अलग रिश्तों की गांठ में,
किन्तु हम रहते हैं अनभिज्ञ,
जब तक कोई आवाज न दे।

-दीपेश

Saturday, February 23, 2013

अपने कुछ भाव आज छोड़ रहा हूँ

अपने कुछ भाव,
आज छोड़ रहा हूँ,

कुछ नाते,
आज तोड़ रहा हूँ,

जीवन की आपा धापी में,
और रिश्तों की आवा जाही में,
अर्थ ही बदल चुका है,
कुछ शब्दों का,

ऐसे दोतरफा भावों को,
उन अनकही बातों को,
उन अधजगी रातों को,
आज छोड़ रहा हूँ,

अधूरे पन्नो को,
बिखरे शब्दों को,
निढाल रागों को,
आज छोड़ रहा हूँ,

उन अपरिणत संवेदनाओं को,
बिखरी अपेक्षाओं को,
निरर्थक मनोभावों को,
आज छोड़ रहा हूँ,

क्षोभित भावों को,
असंगत विचारों को,
बेतुकी बातों को,
आज छोड़ रहा हूँ,,,,,,,


Friday, February 22, 2013

तुम पास नहीं

तुम पास नहीं,
किन्तु बटोर ली हैं मैंने,
तुम्हारी यादें,
तुम्हारा एहसास,
तुम्हारा स्पर्श,

हर वह जगह,
जहाँ बिखेर रखी है तुमने,
अपनी सुगंध,

हर वह स्वप्न,
जहाँ सम्पन्न था मेरा जीवन,
तुम्हारे साथ,

हर वह बात,
जो ज़बान पर आते आते,
रुक गयी थी,

और हृदय में सजा लिया है,
एक मंदिर,
ताकि सुरक्षित रख सकूँ,
हर बात,
उस पल तक,
जब तुम लौटकर आओगी,
शायद,,,,


Tuesday, February 12, 2013

झरोखे से आती हुई भोर की पहली पहली किरणे,
अलसाई हुई आँखों से,
निद्रा वलय को बिखेरती,
.
.
बाहर झांक कर देखा,
तो आज मौसम का मिज़ाज ही नया सा है,
-
-
लौटता हुआ जाड़ा,
लिहाफ़ का आलिंगन,
और हाथ में चाय का मग,
इन कुछ चीजों का मिलन ही अद्भुद है,...

Monday, February 11, 2013

कुछ बातें बेवजह की



कुछ वीरानी सी है यह शाम,
आज शब्दों की कुछ कमी सी है,
रोज की तरह आज भी सूरज डूबते हुए लालिम ही था,
बदला कुछ भी नहीं,
पर कुछ भावनाएँ बदल चुकी हैं,
मेरी नहीं,,
तुम जानती हो किसकी,,
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वैसे तो तुम कभी थी भी नहीं मेरी,
किन्तु एक भाव था तुम्हें अपना माना था कभी,
लरज़िश भरे हाथों से कुछ बातों का पुलिंदा सौंपा था कभी,
आज उन बातों का कुछ अर्थ नहीं,
कुछ बातें बेवजह की थी,
आज उनका कुछ अर्थ नहीं,
तुम्हारे लिए,,,
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हसरतों के रास्ते भी बड़े एकाकी होते हैं,
कोई राज़ी नहीं होता साथ देने को,
साथ रह जाती हैं बस कुछ यादें,
वह भी बिछड़ जाएँगी,
कुछ रास्तों से कटती पगडंडियों की तरह,,,,
कुछ तुम्हारी तरह,
####

कुछ भी तो नहीं है इस मकान में,
दरीचे और दरवाजों के सिवाय,

मेज पर बिखरी पड़ी किताबें,
अलमारी में बेतरतीब पड़े कपड़े,
दीवार पर बीते साल का कैलेंडर

तुम होती तो शायद सजाया होता करीने से,,,
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एक दिन मुरझाएगा,
मेरे बगीचे में लगा वो गुलाब का फूल,
उस पर मंडराता भंवरा भी,
रंजीदा हो चला जाएगा,
बस उस दिन के पहले,
तुम एक बार फिर मिलना,
.
एक आखिरी तोहफा,
तुम्हारे नाम से लिखे कुछ पन्ने,
'कुछ बातें अनकही,'
अब मेरे किसी काम की नहीं।
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Wednesday, November 7, 2012

एकाकीपन की बातें


"एकाकीपन की बातें "

तन्हा होना भी कभी कभी बड़ा सुखद होता है।
खिड़की के किनारे बैठ , 
वह सब कुछ सोच सकते जो हम चाहते हैं,
वह पल जो हमें ख़ुशी देते हैं,
वह बातें जिन्हें याद करके चेहरे पर मुस्कान आ जाए,
हम अपनी मर्जी से चुन सकते हैं वो चेहरे जिन्हें हम याद रखना चाहते हैं ,
उन चेहरों से जुडी यादें और बातें,
उन बातों को भी हम अपनी मर्जी से आने और जाने देते हैं,

सहसा ही मेज पर पड़ी खुली पड़ी एक डायरी के उड़ते हुए पन्ने,
खींच कर ले जाती है कुछ ऐसी यादों के घोंसलों में,
आँखों के सामने उड़ने लगे कुछ सूखे पत्ते,
जो उन घोंसलों को बनाते समय,
गिरे होंगे जमीं पर,
कितना अद्भुद होता है ये मन,
एक छोटी सी चीज से ना जाने कैसे जोड़ लेता है यादें।

समय कभी स्थिर नहीं रहता,
फिर कभी दोहराये नहीं जाएँगे वह पल,
जहाँ अचानक ही खींच ले गया मेरा मन,
अब कभी फिर से यह  जगह नहीं होगी,
उदासी से घिर जाती है वही सुखद यादें,
जिन्हें खुद ही मैंने चुना था,

यही एकाकीपन काटने लगता है, जो कभी सुखद था,
सुखद और दुखद बातों में यही एक फर्क है
सुखद बातें मर्जी से आ या जा सकती हैं 
लेकिन दुखद बातें जब आ जाती है वह हमारी मर्जी से नहीं जाती हैं।

कुछ बातें कभी हमारा साथ नहीं छोडती हैं,
हम संघर्ष करते हैं पर फिर भी हमें समेट लेती हैं कुछ बातें 
जैसे सूखी मिटटी सोख लेती है पानी को।

समय तो चलता रहता है,
कुछ भी चिरस्थायी नहीं रहता,
शेष रहता है एकाकीपन, और उसकी बातें।

-दीपेश भावसार