Saturday, July 7, 2012

नींद



नींद, स्वप्न, परितोष,
शब्द मात्र हैं,
नैराश्य जीवन के,
ये सब उपहास हैं,
प्लावित हुआ अनुताप है,

संताप मैं सर्गित,
मेरे हृदय की,
बस छोटी सी चाह है,

"- नितांत तम से घिरा कमरा,
- सपनों में हर्षित 'मेरा जीवन',
- किसी प्रियतम की थाप्पियाँ ,
- कुछ और नहीं बस थोड़ी 'नींद' की आस है"

Saturday, April 7, 2012



ये ठंडी बयार संध्या की ,

एक अनूठा सा एहसास दे जाती है ,

पुलकित हो उठता है हृदय का रोम रोम ,

और महसूस करता है किसी प्रिय की उपस्तिथि ,

एक स्वप्न सा प्रतीत होता है ये अनुभव ,


ये स्वप्न ही तो है ,

मैं अकेला ही तो हूँ ,

इस स्वप्न को तोड़ने की मंशा नहीं मेरी ,

किन्तु जो सत्य है ,

वो मेरा हृदय कहाँ मानता है ,

क्या यही मिथ्या है ?

अगर ये मिथ्या है ,

तो आज बाध्य हूँ ,

इस मिथ्या को मानने को ,

ये द्वंद है जड़ और चेतन का ,

मेरी चेतना सत्य को मानती नहीं ,

पर इस मधुर स्वप्न के टूटने पर ,

ये आनंद का उतुंग शिखर ,

दूर कहीं बादल सा लगता है ,

हाँ ये बादल की शिला ही तो थी ,

जो सत्य के आगे ठहर ना पाया ,


बिखर गया ...!

उड़ गया ..

Tuesday, December 13, 2011

यादें


कभी  किसी  ख्वाब  में ,
शायद  नजर  आऊंगा ,
या  फिर ,
किसी  भोर  की ,
शीतल  बयार  की  तरह ,
अवगुंठित  कर लूँगा  तुम्हे ,

अमावस्या  की ,
तारों  से  शोभित  रात,
शायद   याद  दिलाये  तुम्हे ,
मेरे  ख्वाबों  की  दुनिया ,
या  पूर्णमासी  का ,
सुनहरा ,
दमकता  चन्द्रमा ,
प्रतीत  कराए ,
मेरा  एकाकी  जीवन ,

पर  व्यथित  ना  होना  तुम ,
क्यूंकि  मैंने  तुम्हे ,
अपने  चारो  और  फैला ,
आभामंडल  माना   है  ,

शायद  तुम्हारी  ठहरी  हुई  आंखे ,
सर्गित  हो  उठे ,
जब  गुलाब  की  कोमल  पंखुरियां ,
मेरा  स्नेहिल  स्पर्श  याद  दिलाये ,
और  उसकी  महक ,
ताज़ा  कर दे ,
उन्ही  सुखद  क्षणों  को,
जब  दिन  का  बड़ा  हिस्सा ,
एकांत  में ,
बाते  करते  हुए  निकलता   था ,

शायद  तुम  फिर  कूची उठाओगी ,
और  उकेरना  चाहोगी  अपने  दिल  को ,
पर  कैनवास  पर ,
बिखरी  लकीरों  में ,
मेरी  सी  अनुभूति  हो  उठेगी  तुम्हे ,

शायद  तुम  फिर  जीना  चाहोगी ,
वही  अध्याय ,
अपने  जीवन  के ,
जहाँ  तुम  मुझसे  मिले  थे .
पर  निष्ठुर  समय  के  सामने ,
फिर  खुदको ,
असमर्थ  पाओगे .......