कभी किसी ख्वाब में ,
शायद नजर आऊंगा ,
या फिर ,
किसी भोर की ,
शीतल बयार की तरह ,
अवगुंठित कर लूँगा तुम्हे ,
अमावस्या की ,
तारों से शोभित रात,
शायद याद दिलाये तुम्हे ,
मेरे ख्वाबों की दुनिया ,
या पूर्णमासी का ,
सुनहरा ,
दमकता चन्द्रमा ,
प्रतीत कराए ,
मेरा एकाकी जीवन ,
पर व्यथित ना होना तुम ,
क्यूंकि मैंने तुम्हे ,
अपने चारो और फैला ,
आभामंडल माना है ,
शायद तुम्हारी ठहरी हुई आंखे ,
सर्गित हो उठे ,
जब गुलाब की कोमल पंखुरियां ,
मेरा स्नेहिल स्पर्श याद दिलाये ,
और उसकी महक ,
ताज़ा कर दे ,
उन्ही सुखद क्षणों को,
जब दिन का बड़ा हिस्सा ,
एकांत में ,
बाते करते हुए निकलता था ,
शायद तुम फिर कूची उठाओगी ,
और उकेरना चाहोगी अपने दिल को ,
पर कैनवास पर ,
बिखरी लकीरों में ,
मेरी सी अनुभूति हो उठेगी तुम्हे ,
शायद तुम फिर जीना चाहोगी ,
वही अध्याय ,
अपने जीवन के ,
जहाँ तुम मुझसे मिले थे .
पर निष्ठुर समय के सामने ,
फिर खुदको ,
असमर्थ पाओगे .......