Tuesday, December 13, 2011

यादें


कभी  किसी  ख्वाब  में ,
शायद  नजर  आऊंगा ,
या  फिर ,
किसी  भोर  की ,
शीतल  बयार  की  तरह ,
अवगुंठित  कर लूँगा  तुम्हे ,

अमावस्या  की ,
तारों  से  शोभित  रात,
शायद   याद  दिलाये  तुम्हे ,
मेरे  ख्वाबों  की  दुनिया ,
या  पूर्णमासी  का ,
सुनहरा ,
दमकता  चन्द्रमा ,
प्रतीत  कराए ,
मेरा  एकाकी  जीवन ,

पर  व्यथित  ना  होना  तुम ,
क्यूंकि  मैंने  तुम्हे ,
अपने  चारो  और  फैला ,
आभामंडल  माना   है  ,

शायद  तुम्हारी  ठहरी  हुई  आंखे ,
सर्गित  हो  उठे ,
जब  गुलाब  की  कोमल  पंखुरियां ,
मेरा  स्नेहिल  स्पर्श  याद  दिलाये ,
और  उसकी  महक ,
ताज़ा  कर दे ,
उन्ही  सुखद  क्षणों  को,
जब  दिन  का  बड़ा  हिस्सा ,
एकांत  में ,
बाते  करते  हुए  निकलता   था ,

शायद  तुम  फिर  कूची उठाओगी ,
और  उकेरना  चाहोगी  अपने  दिल  को ,
पर  कैनवास  पर ,
बिखरी  लकीरों  में ,
मेरी  सी  अनुभूति  हो  उठेगी  तुम्हे ,

शायद  तुम  फिर  जीना  चाहोगी ,
वही  अध्याय ,
अपने  जीवन  के ,
जहाँ  तुम  मुझसे  मिले  थे .
पर  निष्ठुर  समय  के  सामने ,
फिर  खुदको ,
असमर्थ  पाओगे .......