Wednesday, October 29, 2014

कुछ बातें यूँही

सब कुछ वैसा ही है
सिवाए कोने में पड़ा हुआ एक संदूक
जिसमे रख छोड़े हैं मैंने
कुछ यादें और कुछ ख्वाब,

किले में कैद
झांकता हुआ एक शहर
जैसे रिसने लगा हो छोटे से सुराख़ से,

~
तुम आ जाओ ,
इससे पहले कि रिसने लगे,
बुक सेल्फ में छुपी पड़ी
वही पुरानी डायरी।

-दीपेश



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