सब कुछ वैसा ही है
सिवाए कोने में पड़ा हुआ एक संदूक
जिसमे रख छोड़े हैं मैंने
कुछ यादें और कुछ ख्वाब,
किले में कैद
झांकता हुआ एक शहर
जैसे रिसने लगा हो छोटे से सुराख़ से,
~
तुम आ जाओ ,
इससे पहले कि रिसने लगे,
बुक सेल्फ में छुपी पड़ी
वही पुरानी डायरी।
-दीपेश
सिवाए कोने में पड़ा हुआ एक संदूक
जिसमे रख छोड़े हैं मैंने
कुछ यादें और कुछ ख्वाब,
किले में कैद
झांकता हुआ एक शहर
जैसे रिसने लगा हो छोटे से सुराख़ से,
~
तुम आ जाओ ,
इससे पहले कि रिसने लगे,
बुक सेल्फ में छुपी पड़ी
वही पुरानी डायरी।
-दीपेश
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