हाथ में चाय का प्याला लिए खिड़की किनारे आ बैठा हूँ। आसमान में काले बादलों के फ़ाहे हैं। सोच रहा हूँ आज ये कुछ बरसा ही जाएँ तो अच्छा हो। मौसम भी ऐसा है कि मन नहीं कर रहा कुछ करने का। ऐसे ही खाली बैठे बेवजह के ख्याल दिल में आते रहते हैं, ऐसा हो तो कैसा हो, वगैरह वगैरह।
सामने बिजली के तार पर बैठी पानी उड़ाती हुई चिड़िया कितनी खुशनसीब है। जहाँ मर्जी हो उड़कर चले जाओ, जिस जगह दिल आ जाए वहीँ बस जाओ।
यहाँ तो बस एक दरीचा है,
और कुछ दीवारें,
जैसे कुछ बंदिशे हों,
किसी का पहरा हो,
खिड़की से बाहर झांकता हूँ ,
और पाता हूँ दौड़ते भागते लोग,
कहने को आजाद हैं सब,
लेकिन सब समय के बंदी हैं,
बस तार पर झूलती वो चिड़िया ही खुश लगती है,
बरामदे में गिलहरीओं के खाने के लिए हर रोज मम्मी कुछ रख दिया करती हैं कटोरे में। तीन दिन से ज़ोरदार बारिश में रोटी के टुकड़े भीग चुके हैं, और गिलहरीओं के आते पते नहीं थे। आज थोडा पानी रुका तो फिर बरामदे में गिलहरीओं की अठखेलियां अच्छी लग रही है। उनके नन्हे से मुख पर आभार स्पष्ट दिखाई देता है। आज के समय में इन्सान से बेहतर तो यह बेजुबान ही हैं।
###
ऊंची ऊंची इमारतें,
आसमान में उड़ता हवाई जहाज,
सड़कों पर भागती गाड़ियाँ,...
इंसान के दिमाग ने तामीर की थी,
देखते ही देखते फ़ैल गयी ये दुनिया,
सिमट गए रिश्ते,
बदल गए अर्थ,
और बन गए मकान,
मकान ईंट गारे के,
लेकिन बिना प्रेम की सिंचन के,
कभी घर न बन पाए,
चाय तो कब की खत्म हो चुकी है, लेकिन ये बेवजह बातें कभी ख़त्म नहीं होती हैं। अब देखो ये मन भी कितना चंचल होता है, कभी चिड़िया की तरह बिजली के तारों पर झूलता है, और कभी बच्चों की तरह पानी में अठखेलियाँ करता है। बादल फिर गरज बरस रहे हैं, इसलिए खिड़की भी लगा दी है। हम लोग भी विचित्र होते हैं, कभी पानी में खेलने को आतुर होते हैं और कभी नश्वर चीजों के भीगने से डरते हैं।
कुछ और बेवजह की बातें
सामने बिजली के तार पर बैठी पानी उड़ाती हुई चिड़िया कितनी खुशनसीब है। जहाँ मर्जी हो उड़कर चले जाओ, जिस जगह दिल आ जाए वहीँ बस जाओ।
यहाँ तो बस एक दरीचा है,
और कुछ दीवारें,
जैसे कुछ बंदिशे हों,
किसी का पहरा हो,
खिड़की से बाहर झांकता हूँ ,
और पाता हूँ दौड़ते भागते लोग,
कहने को आजाद हैं सब,
लेकिन सब समय के बंदी हैं,
बस तार पर झूलती वो चिड़िया ही खुश लगती है,
बरामदे में गिलहरीओं के खाने के लिए हर रोज मम्मी कुछ रख दिया करती हैं कटोरे में। तीन दिन से ज़ोरदार बारिश में रोटी के टुकड़े भीग चुके हैं, और गिलहरीओं के आते पते नहीं थे। आज थोडा पानी रुका तो फिर बरामदे में गिलहरीओं की अठखेलियां अच्छी लग रही है। उनके नन्हे से मुख पर आभार स्पष्ट दिखाई देता है। आज के समय में इन्सान से बेहतर तो यह बेजुबान ही हैं।
###
ऊंची ऊंची इमारतें,
आसमान में उड़ता हवाई जहाज,
सड़कों पर भागती गाड़ियाँ,...
इंसान के दिमाग ने तामीर की थी,
देखते ही देखते फ़ैल गयी ये दुनिया,
सिमट गए रिश्ते,
बदल गए अर्थ,
और बन गए मकान,
मकान ईंट गारे के,
लेकिन बिना प्रेम की सिंचन के,
कभी घर न बन पाए,
चाय तो कब की खत्म हो चुकी है, लेकिन ये बेवजह बातें कभी ख़त्म नहीं होती हैं। अब देखो ये मन भी कितना चंचल होता है, कभी चिड़िया की तरह बिजली के तारों पर झूलता है, और कभी बच्चों की तरह पानी में अठखेलियाँ करता है। बादल फिर गरज बरस रहे हैं, इसलिए खिड़की भी लगा दी है। हम लोग भी विचित्र होते हैं, कभी पानी में खेलने को आतुर होते हैं और कभी नश्वर चीजों के भीगने से डरते हैं।
कुछ और बेवजह की बातें
No comments:
Post a Comment