बरगद के सूखे पत्तो की झनझनाहट,
बार बार कह रही है,
कि बरसात का मौसम जा चुका है,
एक तुम्हारी यादों का मौसम है,
बरसता रहता है अविरत,
और मैं आसरा ढूंढता रहता हूँ,
तड़पता छटपटाता हूँ,
तुम्हारी यादों से भागता हूँ,
खाली उदास सुनसान राहों पर,
तुम्हारा नाम जुबान पर आते आते,
चुभता है फ़ांस की तरह,
तुम्हारे जाने के बाद,
एक कसक सी है दिल में,
शायद तुम्हारी कमी सी है,
तुम लौट कर आओ अगर,
मैं फिर मिलूँगा तुम्हें,
जेब में भरे कुछ ख्वाब लेकर,
उसी बरगद के पेड़ के नीचे,
सावन के आने से पहले।
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