Saturday, April 7, 2012



ये ठंडी बयार संध्या की ,

एक अनूठा सा एहसास दे जाती है ,

पुलकित हो उठता है हृदय का रोम रोम ,

और महसूस करता है किसी प्रिय की उपस्तिथि ,

एक स्वप्न सा प्रतीत होता है ये अनुभव ,


ये स्वप्न ही तो है ,

मैं अकेला ही तो हूँ ,

इस स्वप्न को तोड़ने की मंशा नहीं मेरी ,

किन्तु जो सत्य है ,

वो मेरा हृदय कहाँ मानता है ,

क्या यही मिथ्या है ?

अगर ये मिथ्या है ,

तो आज बाध्य हूँ ,

इस मिथ्या को मानने को ,

ये द्वंद है जड़ और चेतन का ,

मेरी चेतना सत्य को मानती नहीं ,

पर इस मधुर स्वप्न के टूटने पर ,

ये आनंद का उतुंग शिखर ,

दूर कहीं बादल सा लगता है ,

हाँ ये बादल की शिला ही तो थी ,

जो सत्य के आगे ठहर ना पाया ,


बिखर गया ...!

उड़ गया ..

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