ये ठंडी बयार संध्या की ,
एक अनूठा सा एहसास दे जाती है ,
पुलकित हो उठता है हृदय का रोम रोम ,
और महसूस करता है किसी प्रिय की उपस्तिथि ,
एक स्वप्न सा प्रतीत होता है ये अनुभव ,
ये स्वप्न ही तो है ,
मैं अकेला ही तो हूँ ,
इस स्वप्न को तोड़ने की मंशा नहीं मेरी ,
किन्तु जो सत्य है ,
वो मेरा हृदय कहाँ मानता है ,
क्या यही मिथ्या है ?
अगर ये मिथ्या है ,
तो आज बाध्य हूँ ,
इस मिथ्या को मानने को ,
ये द्वंद है जड़ और चेतन का ,
मेरी चेतना सत्य को मानती नहीं ,
पर इस मधुर स्वप्न के टूटने पर ,
ये आनंद का उतुंग शिखर ,
दूर कहीं बादल सा लगता है ,
हाँ ये बादल की शिला ही तो थी ,
जो सत्य के आगे ठहर ना पाया ,
बिखर गया ...!
उड़ गया ..