नींद, स्वप्न, परितोष,
शब्द मात्र हैं,
नैराश्य जीवन के,
ये सब उपहास हैं,
प्लावित हुआ अनुताप है,
संताप मैं सर्गित,
मेरे हृदय की,
बस छोटी सी चाह है,
"- नितांत तम से घिरा कमरा,
- सपनों में हर्षित 'मेरा जीवन',
- किसी प्रियतम की थाप्पियाँ ,
- कुछ और नहीं बस थोड़ी 'नींद' की आस है"