दीवाली
बात उन दिनों की है जब चाइना की झालरों की जगह घर मोमबत्ती और टिमटिमाते दीपकों से रोशन हुआ करता था। ग्रीन दीवाली क्लीन दीवाली का नारा उस समय चलन में नहीं आया था। मुहल्ले में उस लड़के का बोलबाला हुआ करता था जो 1000 वाली लड़ और लम्बे रॉकेट लेकर आया करता था। धन तेरस का इंतज़ार सालभर किया जाता था क्यूंकि इसी दिन सालभर से जोड़े हुए पैसे से घर गृहस्थी बनाई जाती थी। कपडे या तो जन्मदिन पे लिए जाते थे या किसी की शादी में या फिर दीवाली पर।
महीने भर पहले से पिताजी अंतर्देशीय पत्र और सफ़ेद शीट ले आते थे और हम अपने रिश्तेदारों को शुभकामनाएं खुद अपने हाथों से लिखकर और ग्रीटिंग कार्ड बना कर दिया करते थे। ये वो समय हुआ करता था जब मार्केट में ऑटोमोबाइल की जगह इंसानों की भीड़ हुआ करती थी। माधवगंज से लेकर तिलक चौक तक केशरिया झालरों से सुसज्जित दुकानें और इंसानों की बेइन्तहां भीड़। एक दिन के त्यौहार की तैयारी दशहरा के बाद से ही चालू हो जाती थी। स्कूल में बकर के विषय अक्सर बाजार में आए नए फटाके हुआ करते थे। हर छोटी से छोटी चीज का रोमांच अलग ही हुआ करता था, भले ही वो कपडे हों, फटाके हों, या मिट्टी के दीपक हों। दीवाली के फटाके अक्सर ३-४ दिन पहले ही आ जाते थे, और फिर उन फटाकों के तीन हिस्से, एक मेरा, एक भाई का और एक दीदी का, और मम्मी उन फटाकों को एक थाली में निकाल कर सबसे ऊंची जगह रख देती थी । फटाको की किस्म उम्र पर निर्भर किया करती थी, या यूँ कहलो की फटाकों की आवाज से उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता था, ताजमहल की लड़ और रस्सी बम चलाने की छूट मिलने का मतलब था कि बच्चा बड़ा हो गया है।वैसे फटाकों की मात्रा इतनी कम हुआ करती थी कि बड़ी समझ बूझ के साथ धनतेरस, रूप चौदस, दिवाली और देव उठनी ग्यारस के दिन के लिए फटाके बचाया करते थे। और लड़ को खोलकर एक एक फटाका अलग से फोड़ा करते थे। लेकिन बड़ी गणित लगाने के बाद भी एक घंटे में सब स्वाहा हो जाते थे और फिर एक दूसरे के फटाकों के स्टॉक पर नजर जमाते थे । चकरी को पीतल की परांत में और सांप की गोलिओं को पड़ोसी के दरवाज़े पर चलाने का आनंद ही कुछ और था।
अब तो दीवाली ही बदली सी लगती है। कई समय से मैं भी ग्रीन दीवाली मनाने लगा हूँ। इसलिए रात में छत पर खड़े होकर मुफ्त में आतिशबाजी का आनंद ले लिया करता हूँ। कपड़े हों या घर का कोई नया सामान, किसी भी चीज में कोई रोमांच नहीं रहा है जो उन बचपन के दिनों में रहा करता था।Festive सीजन एक महीने से सिमट कर तीन दिनों में समा गया है। कहते हैं कि इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी के आ जाने से सब काम आसान हो गए हैं। कहाँ दीवाली के समय ग्रीटिंग कार्ड्स का इंतज़ार किया करते थे और अब Facebook और Whatsapp की virtual दुनिया में रोशनी के गति से मिल रही बधाइयों से भी त्यौहार की फील नहीं आती है। कहाँ हम मिट्टी के दीपक की दीपश्रृंखलाओं को देखकर मन प्रफुल्लित कर लिया करते थे और अब रंग बिरंगी बिजली की झालरें भी मन को वह आनंद नहीं दे पाती जो उस समय मिल जाया करता था। शायद दीवाली बदल गयी है या फिर हम बड़े हो गए हैं।
परिवर्तन तो वैसे भी प्रकृति का अपरिवर्तनीय नियम है और त्यौहार का तात्पर्य तो आत्मीय ख़ुशी और अपनों का साथ ही है। इस High Speed जीवन शैली में बस इतना जरूरी है कि त्योहारों के बहाने हम रिश्तों में थोड़ी मिठास लाएं, मावे के गुलाब जामुन न हो तो कैडबरी की डेरी मिल्क ही सही, हाथ से बने ग्रीटिंग कार्ड्स न हो तो Email पर eCards ही सही , आमने सामने बधाईयाँ न दे सकें तो Whatsapp पर मैसेज ही सही, जिस भी रूप में हो सके दीवाली का आनंद उठाईये।
आपको और आपके परिवार को दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक बधाईयाँ।