Wednesday, November 7, 2012

एकाकीपन की बातें


"एकाकीपन की बातें "

तन्हा होना भी कभी कभी बड़ा सुखद होता है।
खिड़की के किनारे बैठ , 
वह सब कुछ सोच सकते जो हम चाहते हैं,
वह पल जो हमें ख़ुशी देते हैं,
वह बातें जिन्हें याद करके चेहरे पर मुस्कान आ जाए,
हम अपनी मर्जी से चुन सकते हैं वो चेहरे जिन्हें हम याद रखना चाहते हैं ,
उन चेहरों से जुडी यादें और बातें,
उन बातों को भी हम अपनी मर्जी से आने और जाने देते हैं,

सहसा ही मेज पर पड़ी खुली पड़ी एक डायरी के उड़ते हुए पन्ने,
खींच कर ले जाती है कुछ ऐसी यादों के घोंसलों में,
आँखों के सामने उड़ने लगे कुछ सूखे पत्ते,
जो उन घोंसलों को बनाते समय,
गिरे होंगे जमीं पर,
कितना अद्भुद होता है ये मन,
एक छोटी सी चीज से ना जाने कैसे जोड़ लेता है यादें।

समय कभी स्थिर नहीं रहता,
फिर कभी दोहराये नहीं जाएँगे वह पल,
जहाँ अचानक ही खींच ले गया मेरा मन,
अब कभी फिर से यह  जगह नहीं होगी,
उदासी से घिर जाती है वही सुखद यादें,
जिन्हें खुद ही मैंने चुना था,

यही एकाकीपन काटने लगता है, जो कभी सुखद था,
सुखद और दुखद बातों में यही एक फर्क है
सुखद बातें मर्जी से आ या जा सकती हैं 
लेकिन दुखद बातें जब आ जाती है वह हमारी मर्जी से नहीं जाती हैं।

कुछ बातें कभी हमारा साथ नहीं छोडती हैं,
हम संघर्ष करते हैं पर फिर भी हमें समेट लेती हैं कुछ बातें 
जैसे सूखी मिटटी सोख लेती है पानी को।

समय तो चलता रहता है,
कुछ भी चिरस्थायी नहीं रहता,
शेष रहता है एकाकीपन, और उसकी बातें।

-दीपेश भावसार 


Monday, October 1, 2012

रात और नींद

" रात और नींद "

नींद के पीछे भागते हुए,
कुछ थक सा गया हूँ,
क्यूं ना थोडा रुका जाए, 
सुना है बहुत खूबसूरत होती है रात 
तो आज इसे परखा जाए,

बंद कमरे में,
खिड़की पर खटखटाती हुई,
चाँद की सफ़ेद रोशनी ने,
बाध्य कर दिया  आज, 
महीनो से बंद पड़ी खिड़की खोलने को,

कमरा कुछ नया सा लग रहा है आज,
रात कुछ नयी सी है,
झींगुरों की कर्कश आवाज़,
कुछ मधुर संगीत सी लग रही है,

देखा नहीं पहले इस नजरिये से शायद,
कभी रुक कर देखी नहीं थी रात ,
खूबसूरत है,
बिना ख्वाबों  के भी,

खिड़की से,
छन के आ रही है ज़िन्दगी,
मैं बटोर लेता हूँ,
चादर में समेट  लेता हूँ...



Friday, September 21, 2012

प्रतिध्वनि


"भूल  जा  वो  गुजरे  पल ,
आ  चल , नई  शुरुआत  करते  हैं ,
छोड़ी  थी  जहाँ  अधूरी ,
वह  कविता ,
कुछ   शब्दों  और कुछ  छंदों  से ,
पुनः  अलंकृत  करते   हैं ,"

प्रतिध्वनि -----

"बिखरे  हुए  शब्दों  से ,
कोई  गीत  अब  ना रचा  जायेगा ,
अधूरे  पड़े  थे  जो  पन्ने ,
आंसुओं  से  मैं  भर  चुका  हूँ ."

Saturday, July 7, 2012

नींद



नींद, स्वप्न, परितोष,
शब्द मात्र हैं,
नैराश्य जीवन के,
ये सब उपहास हैं,
प्लावित हुआ अनुताप है,

संताप मैं सर्गित,
मेरे हृदय की,
बस छोटी सी चाह है,

"- नितांत तम से घिरा कमरा,
- सपनों में हर्षित 'मेरा जीवन',
- किसी प्रियतम की थाप्पियाँ ,
- कुछ और नहीं बस थोड़ी 'नींद' की आस है"

Saturday, April 7, 2012



ये ठंडी बयार संध्या की ,

एक अनूठा सा एहसास दे जाती है ,

पुलकित हो उठता है हृदय का रोम रोम ,

और महसूस करता है किसी प्रिय की उपस्तिथि ,

एक स्वप्न सा प्रतीत होता है ये अनुभव ,


ये स्वप्न ही तो है ,

मैं अकेला ही तो हूँ ,

इस स्वप्न को तोड़ने की मंशा नहीं मेरी ,

किन्तु जो सत्य है ,

वो मेरा हृदय कहाँ मानता है ,

क्या यही मिथ्या है ?

अगर ये मिथ्या है ,

तो आज बाध्य हूँ ,

इस मिथ्या को मानने को ,

ये द्वंद है जड़ और चेतन का ,

मेरी चेतना सत्य को मानती नहीं ,

पर इस मधुर स्वप्न के टूटने पर ,

ये आनंद का उतुंग शिखर ,

दूर कहीं बादल सा लगता है ,

हाँ ये बादल की शिला ही तो थी ,

जो सत्य के आगे ठहर ना पाया ,


बिखर गया ...!

उड़ गया ..