Monday, October 1, 2012

रात और नींद

" रात और नींद "

नींद के पीछे भागते हुए,
कुछ थक सा गया हूँ,
क्यूं ना थोडा रुका जाए, 
सुना है बहुत खूबसूरत होती है रात 
तो आज इसे परखा जाए,

बंद कमरे में,
खिड़की पर खटखटाती हुई,
चाँद की सफ़ेद रोशनी ने,
बाध्य कर दिया  आज, 
महीनो से बंद पड़ी खिड़की खोलने को,

कमरा कुछ नया सा लग रहा है आज,
रात कुछ नयी सी है,
झींगुरों की कर्कश आवाज़,
कुछ मधुर संगीत सी लग रही है,

देखा नहीं पहले इस नजरिये से शायद,
कभी रुक कर देखी नहीं थी रात ,
खूबसूरत है,
बिना ख्वाबों  के भी,

खिड़की से,
छन के आ रही है ज़िन्दगी,
मैं बटोर लेता हूँ,
चादर में समेट  लेता हूँ...



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