बड़ी देर से हाथ डगमगा रहे हैं,
शब्द भी हैं, भाव भी हैं,
किन्तु छंद नहीं है,
जिसको अपने मन की बात बतानी है,
वो भी नहीं है,
वो भी नहीं है,
शायद उसे डर था
मैं फिर अपनी किताब खोलकर बैठ जाऊंगा,
मैं फिर अपनी किताब खोलकर बैठ जाऊंगा,
हर बात कहने लायक नहीं होती,
कुछ बातें बेवजह की होती हैं,
मैं जानता हूँ उन बातों को,
इसलिए पृथक कर रख लेता हूँ,
एक कमरे में हृदय के परम छोर पर,
जहाँ केवल मैं जा सकता हूँ,
किन्तु अब भी मेरे हृदय में,
एक बात बड़ी जोर से चुभती है,
कि एक बार,
बस आखिरी बार,
तुमने सुना होता मुझे,
जाने से पहले एक बार,
झाँका होता मेरे मन को,
टटोली होती बेवजह की बातें,
हर भाव को शब्दों में पिरोना बड़ा मुश्किल होता है,
उन्हें मेरी आँखों में खोजा होता,
काश! एक बार।
तो शायद,
फिर कभी न खोलता वह कमरा,
न कहता कभी यह बातें बेवजह।
कुछ बातें बेवजह की होती हैं,
मैं जानता हूँ उन बातों को,
इसलिए पृथक कर रख लेता हूँ,
एक कमरे में हृदय के परम छोर पर,
जहाँ केवल मैं जा सकता हूँ,
किन्तु अब भी मेरे हृदय में,
एक बात बड़ी जोर से चुभती है,
कि एक बार,
बस आखिरी बार,
तुमने सुना होता मुझे,
जाने से पहले एक बार,
झाँका होता मेरे मन को,
टटोली होती बेवजह की बातें,
हर भाव को शब्दों में पिरोना बड़ा मुश्किल होता है,
उन्हें मेरी आँखों में खोजा होता,
काश! एक बार।
तो शायद,
फिर कभी न खोलता वह कमरा,
न कहता कभी यह बातें बेवजह।
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