ढल रही है शाम,
हवा भी मद्धम हो चली है,
अंतहीन ख़ामोशी,
सुन सकता हूँ मैं अब,
तुम्हारी सरगोशियाँ,
मेरे कानों में,
सम्भ्रमित मैं,
पत्तों की सरसराहट से,
कि कहीं यह तुम्हारी आमद तो नहीं,
व्याकुलता से दरवाजे को ताकता,
मुस्कुराता हूँ,
####
प्रेम सबको ढूँढ ही लेता है,
सुख की घनी चादर बनकर,
ढक दे जो छोटे छोटे दुखों को,
प्रेम आता है जीवन में,
बनकर उपहार,
अलग अलग रिश्तों की गांठ में,
किन्तु हम रहते हैं अनभिज्ञ,
जब तक कोई आवाज न दे।
-दीपेश
हवा भी मद्धम हो चली है,
अंतहीन ख़ामोशी,
सुन सकता हूँ मैं अब,
तुम्हारी सरगोशियाँ,
मेरे कानों में,
सम्भ्रमित मैं,
पत्तों की सरसराहट से,
कि कहीं यह तुम्हारी आमद तो नहीं,
व्याकुलता से दरवाजे को ताकता,
मुस्कुराता हूँ,
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प्रेम सबको ढूँढ ही लेता है,
सुख की घनी चादर बनकर,
ढक दे जो छोटे छोटे दुखों को,
प्रेम आता है जीवन में,
बनकर उपहार,
अलग अलग रिश्तों की गांठ में,
किन्तु हम रहते हैं अनभिज्ञ,
जब तक कोई आवाज न दे।
-दीपेश
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